हरित उपभोक्तावाद और भ्रष्टाचार
क्या भ्रष्टाचार व्यक्ति करता है, या समाज उससे करवाता है?
"मलाई" – एक शब्द जिसने पूरे समाज की नैतिकता बदल दी
"राहुल आज रेलवे का एग्जाम पास करके टी.टी. बन गया था। “घर में चारों तरफ़ खुशी का माहौल था। माँ ने मंदिर में प्रसाद चढ़ाया। पिताजी की आँखों में वर्षों की मेहनत का सुकून दिखाई दे रहा था। रिश्तेदारों के फोन लगातार आ रहे थे।"बधाई हो... अब तो लड़का सेटल हो गया।" शाम को राहुल हमेशा की तरह मोहल्ले की उसी छोटी-सी चाय की दुकान पर पहुँचा, जहाँ वह बचपन से चाय पीता आया था।
"पप्पू... एक चाय बना यार।"
पप्पू हँसते हुए बोला-"राहुल भैया, आज पैसे नहीं लगेंगे। फ्री की चाय पियो।""क्यों बे, आज क्या बात है?"
"कल मेरी शादी है।" "अरे वाह! बहुत बढ़िया।" दोनों हँस पड़े। चाय की पहली चुस्की लेते ही राहुल के मन में एक विचार आया- "अच्छा हुआ पिताजी ने मुझे पढ़ने भेज दिया। नहीं तो आज मैं भी चाय बेच रहा होता।" राहुल को पूरा विश्वास था कि आज जो वह टी.टी. बना है, उसके पीछे उसके माता-पिता की वर्षों की तपस्या और उसकी अपनी मेहनत है। और सच भी यही था। लेकिन राहुल को अभी यह नहीं पता था कि नौकरी मिलने के बाद उसकी सबसे बड़ी परीक्षा शुरू होने वाली है। घर पहुँचा तो रिश्तेदार बैठे थे।
एक चाचा बोले-
"अब शादी कर दो लड़के की।" दूसरे बोले- "हाँ, अब तो पूरी तरह सेटल हो गया है।"
तीसरे ने हँसते हुए कहा- "टी.टी. की नौकरी में तो तनख्वाह से ज़्यादा ऊपर की कमाई होती है।"
इतने में पीछे बैठे एक बुजुर्ग बोले—"अरे... ऊपर की कमाई मत बोलो..." "मलाई बोलो... मलाई..."
पूरा कमरा हँसी से गूँज उठा। किसी को यह मज़ाक लगा। लेकिन यहीं से कहानी शुरू होती है।
ज़रा सोचिए...हमने रिश्वत का नाम बदलकर "मलाई" क्यों रख दिया? क्योंकि "रिश्वत" शब्द सुनते ही अपराध याद आता है। लेकिन "मलाई" सुनते ही दिमाग़ में स्वाद आता है, फायदा आता है, चतुराई आती है। एक शब्द बदलने से अपराध भी सामान्य लगने लगता है। यही समाज की सबसे बड़ी चाल है।
यहीं मैं आपसे एक सवाल पूछना चाहता हूँ। क्या कभी आपने किसी को यह कहते सुना है- "मेरा बेटा ईमानदार टी.टी. है।" बहुत कम। लेकिन यह बात आपने सैकड़ों बार सुनी होगी- "मेरा लड़का टी.टी. है, ऊपर की कमाई भी अच्छी है।" यानी नौकरी का सम्मान उसकी सेवा के कारण नहीं, उसकी मलाई के कारण होने लगा।
यहीं से भ्रष्टाचार पैदा नहीं होता, यहीं से भ्रष्टाचार सम्मानित होना शुरू होता है। हम अक्सर कहते हैं कि भारत में भ्रष्टाचार बहुत है। लेकिन कभी यह नहीं पूछते कि भ्रष्टाचार करता कौन है? क्या केवल सरकारी कर्मचारी? नहीं।
जिस दिन कोई यात्री बिना टिकट ट्रेन में चढ़कर टी.टी. से कहता है—
"साहब, कुछ ले-देकर सीट दिला दो,"उस दिन रिश्वत लेने वाला अकेला दोषी नहीं होता। देने वाला भी उतना ही तैयार बैठा होता है। हर भारतीय चाहता है कि अगर सिस्टम काम न करे, तो थोड़ा पैसा देकर उसका काम हो जाए। हर टी.टी. जानता है कि लोग पैसा देने को तैयार हैं। और हर यात्री जानता है कि टी.टी. पैसा लेने को तैयार है। यानी भ्रष्टाचार किसी एक आदमी का काम नहीं है। यह समाज और व्यक्ति के बीच हुआ एक अनकहा समझौता है। अब ज़रा लोकतंत्र की बात करते हैं। जिस सरकार को आपने वोट देकर चुना, जिस रेलवे व्यवस्था को आपने स्वीकार किया, अगर वही व्यवस्था आपको आपकी आरक्षित सीट तक नहीं पहुँचा पा रही, और आपको सीट पाने के लिए "मलाई" देनी पड़ रही है, तो यह केवल टी.टी. की असफलता नहीं है। यह पूरे सिस्टम की असफलता है। लेकिन हमने सिस्टम बदलने की जगह एक आसान रास्ता खोज लिया-"चलो भाई, थोड़ा दे दो, काम हो जाएगा।" धीरे-धीरे यह "थोड़ा" हमारी संस्कृति बन गया।
अब लोग गर्व से कहते हैं-"यार, मैंने टी.टी. को थोड़ी-सी मलाई दी, बेचारा मान गया, सीट दे दी।" ज़रा इस वाक्य पर ध्यान दीजिए। हम रिश्वत देने पर शर्मिंदा नहीं होते। बल्कि कहानी सुनाते हैं जैसे कोई बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली हो। यानी भ्रष्टाचार केवल कानून का विषय नहीं रहा। वह सामाजिक प्रतिष्ठा बन गया।
"सेटल लड़का"
राहुल की नौकरी को अभी छह महीने भी पूरे नहीं हुए थे कि उसके घर में एक नया शब्द रोज़ सुनाई देने लगा-
"अब लड़का सेटल हो गया है।"अब जरा रुकिए, मैं आपसे पूछना चाहता हूँ- सेटल होने का मतलब क्या होता है? क्या राहुल पहले गैर-जिम्मेदार था और अब जिम्मेदार हो गया? क्या पहले उसका चरित्र कमजोर था और अब मजबूत हो गया? क्या पहले वह अच्छा इंसान नहीं था और अब बन गया?नहीं। राहुल वही था। बदली थी केवल उसकी नौकरी। लेकिन भारतीय समाज में आदमी का मूल्य उसके चरित्र से नहीं, उसकी नौकरी से तय होने लगता है। और अगर नौकरी सरकारी हो तो समाज उसे सीधे "सेटल" घोषित कर देता है।
अब लड़की ढूँढ़ी जाने लगी। लड़की देखने के अपने पैरामीटर होते हैं।
लंबाई कैसी है?
रंग कैसा है?
पढ़ी-लिखी है?
खाना बना लेती है?
पर सबसे बड़ा सवाल क्या होता है?
"हमारे घर में एडजस्ट कर पाएगी या नहीं?" "एडजस्ट?” भारतीय परिवारों का शायद सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला शब्द। लेकिन एडजस्टमेंट का मतलब क्या है? अक्सर इसका मतलब होता है- "हम जैसे हैं, वैसे ही रहेंगे। बदलना तुम्हें है।" उधर रिया के घर भी एक रिश्ता पहुँचा। "लड़का रेलवे में टी.टी. है।" बस इतना सुनना था कि घर का माहौल बदल गया। रिया की माँ मुस्कुराईं। पिताजी ने बिना मिले ही मन में हिसाब लगाना शुरू कर दिया। सरकारी नौकरी। हर महीने पक्का वेतन। बुढ़ापे में पेंशन। और मन के किसी कोने में एक और बात-
"ऊपर की कमाई भी होगी।"
क्योंकि समाज ने उन्हें सिखा दिया था-"सब लेते हैं।"यही सबसे खतरनाक वाक्य है। क्योंकि जिस दिन समाज "सब करते हैं" बोलना शुरू कर देता है,उस दिन अपराध, अपराध नहीं रह जाता। वह परंपरा बन जाता है। राहुल और रिया की पहली मुलाकात हुई। दस मिनट की बातचीत। दस मिनट में तय हो गया कि दोनों पूरी जिंदगी साथ बिताएँगे। रिया अपने पिताजी से कहा- "लड़का ठीक है।"(रिया के मन में एक बात और थी।जिसे वह किसी से नहीं कह पाई। उसका पहले एक दोस्त था, धीरे-धीरे वह दोस्ती प्रेम में बदल गई थी। लेकिन उसने अपने माता-पिता को कभी नहीं बताया। क्यों? क्योंकि उसे डर था। उसे लगा अगर उसने सच बोल दिया तो शायद उसके माता-पिता टूट जाएँगे। हमारे समाज में कई बार बच्चे झूठ इसलिए नहीं बोलते कि वे गलत हैं, वे इसलिए छिपाते हैं क्योंकि सच बोलने की जगह ही नहीं होती।
सगाई हो गई। दोनों परिवार खुश थे। रिश्ता पक्का हो गया। अब दोनों परिवारों के सामने एक ही सवाल था-
"शादी कैसी होगी?" सबसे बड़ा सवाल केवल एक था- "समाज को क्या दिखेगा?" दोनों परिवारों ने तय किया कि शादी ऐसी होनी चाहिए जिसे लोग वर्षों तक याद रखें। बैंक्वेट हॉल बड़ा होना चाहिए। लाइटिंग शानदार होनी चाहिए। खाना कम से कम 50–60 प्रकार का होना चाहिए। बारात में गाड़ियाँ कम नहीं दिखनी चाहिए।
वीडियो सिनेमैटिक होना चाहिए। सोशल मीडिया पर फोटो देखकर लोग कहें-
"वाह क्या शादी की है!"यहीं से Consumerism शुरू होता है। जब आवश्यकता समाप्त हो जाती है और प्रदर्शन (Display) शुरू हो जाता है। अब राहुल पर दबाव बढ़ गया। शादी में खर्च भी करना था। समाज में प्रतिष्ठा भी बनाए रखनी थी। रिश्तेदारों की अपेक्षाएँ भी पूरी करनी थीं। अब राहुल के सामने केवल दो रास्ते थे। या तो अपनी आय के अनुसार साधारण शादी करे या फिर समाज की अपेक्षाओं के अनुसार खर्च करे। उसने दूसरा रास्ता चुना और उस रास्ते का सबसे आसान साधन था-
"मलाई।" अब राहुल पहले से अधिक "मलाई" घर लाने लगा। उसे लगता था- "मैं अपने लिए नहीं कमा रहा। मैं अपने परिवार की इज़्ज़त के लिए कमा रहा हूँ।" दूसरी तरफ़ रिया का परिवार भी उतना ही खुश था। उन्हें यह जानने की इच्छा नहीं थी कि शादी का खर्च किस पैसे से चल रहा है। उन्हें केवल इतना दिखाई दे रहा था कि होने वाला दामाद "अच्छा कमा" रहा है। यहीं समझने वाली बात है। भ्रष्टाचार केवल राहुल नहीं कर रहा था। उस भ्रष्टाचार पर दो परिवार अपना भविष्य खड़ा कर रहे थे। दोनों परिवारों की सामाजिक प्रतिष्ठा उसी पैसे से बढ़ रही थी। समाज भी उसी पैसे की प्रशंसा कर रहा था। और फिर हम कहते हैं-
"देश में भ्रष्टाचार बहुत है।"भ्रष्टाचार केवल लेने वाला नहीं बढ़ाता, उसे स्वीकार करने वाला समाज भी उतना ही बढ़ाता है। अब ज़रा विवाह की बात करते हैं। भारतीय कानून के अनुसार अगर दो बालिग व्यक्ति अदालत (Court) में जाकर, चार गवाहों की उपस्थिति में, लगभग दस हज़ार रुपये के खर्च में विवाह कर लें तो वह विवाह पूरी तरह वैध (Valid) है। उसे वही कानूनी मान्यता प्राप्त है, जो एक करोड़ रुपये खर्च करके, दस हज़ार लोगों को बुलाकर की गई शादी को प्राप्त है। कानून दोनों को बराबर मानता है। लेकिन समाज? समाज दोनों को बराबर नहीं मानता। समाज अक्सर पूछता है- "अरे कोर्ट मैरिज कर ली?" जैसे कोई कमी रह गई हो। जैसे शादी नहीं, कोई मजबूरी पूरी की गई हो। विडंबना देखिए। निर्णय समाज को दिखाने के लिए नहीं, जीवन जीने के लिए लिया जाता है। लेकिन राहुल और रिया के परिवार की सोच अलग थी। उनके लिए शादी तब तक पूरी नहीं मानी जाती, जब तक पूरा समाज उसे देख न ले। जब तक हजारों लोग खाना न खा लें। जब तक मंच पर घंटों फोटो न खिंच जाएँ। जब तक लोग महीनों तक उसकी चर्चा न करें। यानी विवाह, दो व्यक्तियों के जीवन का आरंभ कम और सामाजिक प्रतिष्ठा का सार्वजनिक प्रदर्शन अधिक बन गया।
यही उपभोक्तावाद (Consumerism) है। जब खर्च, आवश्यकता से नहीं दूसरों को प्रभावित करने की इच्छा से तय होने लगे। यही वह मानसिकता है जो व्यक्ति को उसकी आय से बड़ा जीवन जीने के लिए मजबूर करती है। और जब इच्छाएँ आय से बड़ी हो जाती हैं तब उस अंतर को भरने के लिए सबसे आसान रास्ता भ्रष्टाचार बन जाता है। इसलिए हर भ्रष्टाचार की जड़ लालच नहीं होती। कई बार उसकी जड़ सामाजिक प्रतिष्ठा होती है। और सामाजिक प्रतिष्ठा का सबसे महँगा रूप है- दिखावे वाला उपभोग। राहुल और रिया की शादी धूमधाम से हुई। बैंड बजा। आतिशबाज़ी हुई। हज़ारों लोगों ने भोजन किया। लोगों ने कहा-"वाह क्या शादी थी!" लेकिन किसी ने यह नहीं पूछा-"इस शादी की असली कीमत किसने चुकाई?" राहुल ने? रिया ने? या ईमानदारी ने?
अध्याय: वायरल
शादी को लगभग एक साल हो चुका था। बाहर से देखने पर सब कुछ ठीक दिखाई देता था। नया घर। नई कार। महँगा फर्नीचर। एल.ई.डी. ए.सी. सोने के गहने। महँगे मोबाइल। लोग जब भी घर आते, एक ही बात कहते- "वाह राहुल तरक्की कर दी।" किसी ने कभी नहीं पूछा- "इतनी जल्दी इतना सब कैसे हो गया?"क्योंकि हमारे समाज में सवाल पैसे के स्रोत पर नहीं पैसे के प्रदर्शन पर होते हैं। जितना बड़ा घर उतना बड़ा सम्मान। जितनी महँगी गाड़ी उतनी बड़ी प्रतिष्ठा। यानी आदमी की कीमत उसके चरित्र से नहीं उसके उपभोग (Consumerism) से तय होने लगी। इधर राहुल बदल रहा था। पहले रिश्वत लेते समय हाथ काँपते थे। अब नहीं काँपते थे।पहले हर नोट जेब में रखते समय अपराध-बोध होता था। अब नहीं होता था।आदमी गलत काम करते-करते गलत नहीं बनता वह गलत को सामान्य मानने लगता है और यही सबसे खतरनाक स्थिति होती है।
एक दिन ट्रेन में हमेशा की तरह भीड़ थी। वेटिंग लिस्ट वाले यात्री परेशान थे। एक यात्री धीरे से राहुल के पास आया। "साहब, सीट मिल जाएगी?" राहुल ने उसकी तरफ देखा। दोनों बिना कुछ बोले एक-दूसरे की बात समझ गए। यात्री ने जेब से नोट निकाले। राहुल ने हाथ बढ़ाया।बस इस बार फर्क इतना था कि सामने वाला यात्री अकेला नहीं था। पीछे एक मोबाइल कैमरा चालू था। आजकल हर आदमी पत्रकार है। हर मोबाइल एक कैमरा है। और हर कैमरा किसी की जिंदगी बदल सकता है। राहुल को पता भी नहीं चला कि उसकी पूरी "मलाई" कैमरे में रिकॉर्ड हो चुकी है।
शाम तक वीडियो इंस्टाग्राम पर था। फिर फेसबुक पर। फिर यूट्यूब पर। फिर व्हाट्सऐप पर।वीडियो के नीचे हजारों टिप्पणियाँ थीं- "ऐसे भ्रष्ट लोगों की वजह से देश बर्बाद है।" "इनको नौकरी से निकाल देना चाहिए।" "सारे सरकारी कर्मचारी ऐसे ही होते हैं।" राहुल बार-बार वही वीडियो देख रहा था। उसे पहली बार लगा शायद उसने सचमुच अपराध किया है।
रेलवे विभाग ने भी वीडियो देखा। जाँच बैठी। पहले निलंबन (Suspension) हुआ। कुछ महीनों बाद सेवा समाप्त (Termination) का आदेश आ गया। जिस नौकरी के कारण समाज उसे "सेटल लड़का" कहता था उसी नौकरी के जाने के बाद वही समाज कहने लगा-"देखा बेईमानी का यही अंजाम होता है।" यही समाज की सबसे बड़ी विडंबना है। जब राहुल रिश्वत लेकर घर बना रहा था, तब समाज उसकी तारीफ कर रहा था। जब वही रिश्वत कैमरे में रिकॉर्ड हो गई तो वही समाज उसे अपराधी कहने लगा। यानी समाज को भ्रष्टाचार से समस्या नहीं थी। समस्या केवल उसके पकड़े जाने से थी। अब राहुल के घर का हिसाब बदल चुका था। वेतन बंद। "मलाई" बंद। लेकिन खर्च? वे वैसे ही थे। कार की किश्त। घर का लोन। बहन की शादी में लिया गया उधार। क्रेडिट कार्ड। रिश्तेदारों से लिया पैसा। सब अपनी जगह खड़े थे। यहीं Consumerism का दूसरा चेहरा दिखाई देता है। महँगी जीवनशैली अपनाना आसान है। लेकिन उसे छोड़ना सबसे कठिन काम है। गरीब पैदा होना मुश्किल नहीं होता। गरीबी में जीवन जीना भी सीखा जा सकता है। लेकिन अमीर जैसी जीवनशैली जीने के बाद अचानक साधारण जीवन में लौटना बहुत लोगों के लिए मानसिक आघात बन जाता है। कई परिवार यहीं टूटते हैं। घर का माहौल बदलने लगा। जहाँ पहले शाम को हँसी सुनाई देती थी, अब चिंता सुनाई देती थी। जहाँ पहले भविष्य की योजनाएँ बनती थीं, अब अगले महीने की किश्त का हिसाब बनने लगा। जहाँ पहले "मलाई" की चर्चा होती थी अब वकीलों और नोटिसों की। राहुल चुप रहने लगा। रिया भी चुप रहने लगी। दोनों एक-दूसरे को दोष नहीं दे रहे थे लेकिन दोनों जानते थे कि उनकी जिंदगी उस रास्ते पर आ गई है, जहाँ से वापस लौटना आसान नहीं है।
इसी बीच एक शाम राहुल फिर उसी चाय की दुकान पर पहुँचा। वही पप्पू, वही दुकान, वही केतली, लेकिन आज दोनों की जिंदगी बदल चुकी थी। पप्पू ने राहुल को देखते ही कहा-"राहुल भैया आज भी चाय फ्री।"राहुल ने फीकी मुस्कान के साथ पूछा "अब क्या हुआ?" पप्पू हँसा। "दो दिन पहले बेटा हुआ है।" राहुल ने पहली बार पप्पू को ध्यान से देखा। छोटी-सी दुकान थी। आय सीमित थी। लेकिन चेहरे पर संतोष था। पत्नी साथ खड़ी थी। बच्चे दुकान के बाहर खेल रहे थे। न कोई ई.एम.आई. का तनाव, न किसी वायरल वीडियो का डर, न नौकरी जाने का भय। राहुल के मन में वही पुराना विचार फिर आया-"अच्छा हुआ मैं चाय वाला नहीं बना" लेकिन इस बार उसने उसी विचार को बीच में ही रोक दिया।उसने पहली बार खुद से पूछा- "सच में अच्छा हुआ था?" और शायद यही सवाल उसकी जिंदगी का सबसे कठिन सवाल था।
शाम ढल रही थी।राहुल फिर उसी चाय की दुकान के बाहर बैठा था।हाथ में चाय थी लेकिन चाय कब ठंडी हो गई, उसे पता ही नहीं चला। इतने में सड़क से एक वृद्ध साधु धीरे-धीरे चलते हुए आए। हाथ में पीतल का एक छोटा-सा कटोरा था। वे हर दुकान पर रुकते और कहते- "भिक्षां देहि, भिक्षां देहि" कुछ लोग दो रुपये दे रहे थे। कुछ पाँच। कुछ बिना देखे आगे बढ़ जा रहे थे। साधु राहुल के सामने आकर रुके।"बेटा भिक्षां देहि।" राहुल हल्का-सा मुस्कुराया। उस मुस्कान में दर्द था। उसने कहा-"बाबा अब मैं तुम्हें क्या दूँ? आज तो मैं खुद भिखारी बन गया हूँ। अगर देना ही है तो तुम ही मुझे दे दो।" साधु कुछ क्षण तक राहुल को देखते रहे। फिर उन्होंने बिना कुछ कहे अपने कटोरे में हाथ डाला। कुछ सिक्के निकाले। राहुल की हथेली पर रख दिए। और मुस्कुराकर बोले-"करता था सो क्यों किया, अब कर क्यों पछताय।
बोए पेड़ बबूल का, आम कहाँ ते खाय॥" इतना कहकर साधु आगे बढ़ गए।
राहुल की मुट्ठी में कुछ सिक्के थे लेकिन उसके भीतर जैसे वर्षों से जमा हुई आवाज़ टूटकर बाहर आने लगी। उसकी आँखों से आँसू बह निकले।वह सोचने लगा “आज मैं इतना गिर गया कि एक भिक्षुक भी मुझे देकर चला गया।" जीवन भर मैं यही सोचता रहा-
मुझे क्या मिलेगा?
मेरा परिवार कैसे आगे बढ़ेगा?
मेरा घर कैसा होगा?
मेरी गाड़ी कौन-सी होगी?
मेरी प्रतिष्ठा कितनी होगी?
हर बार मैंने समाज से पूछा-
"तुमने मेरे लिए क्या किया?"
लेकिन एक बार भी मैंने खुद से नहीं पूछा- "मैंने समाज के लिए क्या किया?" मैंने इस धरती से लिया, हवा ली, पानी लिया, अन्न लिया, रेलवे की नौकरी ली, समाज का सम्मान लिया, यात्रियों का विश्वास लिया, और जब मौका मिला उसी विश्वास की कीमत वसूल ली। मैंने हर रिश्ते को कमाई की नज़र से देखा। नौकरी सेवा नहीं रही, कमाई की मशीन बन गई। शादी जीवन का संस्कार नहीं रही सामाजिक प्रदर्शन बन गई। घर आश्रय नहीं रहा प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गया। मैंने पूरी दुनिया को उपभोग की वस्तु समझ लिया।हर चीज़ से यही पूछा-"तू मुझे क्या दे सकती है?" लेकिन कभी यह नहीं पूछा- "मैं तुझे क्या दे सकता हूँ?” शायद यही भ्रष्टाचार है। रिश्वत लेना ही भ्रष्टाचार नहीं है। बिना कुछ लौटाए केवल लेते जाना भी भ्रष्टाचार है।प्रकृति से लेते जाना,समाज से लेते जाना, रिश्तों से लेते जाना,देश से लेते जाना और बदले में केवल अपनी इच्छाएँ पूरी करना। आज समझ आया मैं केवल रिश्वतखोर नहीं था। मैं उपभोक्ता बन गया था। और उपभोक्ता भी ऐसा जो पूरी दुनिया को केवल अपनी ज़रूरत पूरी करने का साधन समझता रहा। शायद यहीं से हरित उपभोक्तावाद (Green Consumerism) की शुरुआत होती है। जिस दिन आदमी यह पूछना शुरू कर दे-"समाज ने मुझे क्या दिया?" से पहले "मैंने समाज को क्या दिया?" उसी दिन भ्रष्टाचार की जड़ सूखनी शुरू हो जाएगी।
अध्याय: मैंने समाज से लिया क्या, दिया क्या?
मैं उपभोक्ता नहीं, सह-निर्माता हूँ, वह साधु की ओर देखता है। साधु दूर जा चुके हैं। राहुल अपनी मुट्ठी खोलता है। भिखारी के दिए हुए वे पाँच रुपये अभी भी उसकी हथेली में रखे हैं। वह पाँच रुपये उसके जीवन के सबसे बड़े दान थे। क्योंकि पहली बार किसी ने उसे पैसे नहीं दृष्टि (Vision) दी थी। राहुल उठता है।सीधे पप्पू की दुकान पर जाता है। कहता है-"पप्पू,आज से चाय के पैसे मैं दूँगा।" पप्पू हँसकर कहता है- "अरे भैया, रहने दो।" राहुल मुस्कुराता है। "नहीं आज पहली बार समझ आया है कि केवल लेने वाला आदमी कभी अमीर नहीं होता। देने वाला आदमी हमेशा बड़ा होता है।" वह पाँच रुपये साधु के कटोरे में वापस रखने के लिए दौड़ता है लेकिन साधु कहीं दिखाई नहीं देते। राहुल मुस्कुराता है। आसमान की तरफ़ देखता है।धीरे से कहता है-
"शायद ईश्वर भिक्षा माँगने नहीं आए थे, मुझे इंसान बनाने आए थे।"भ्रष्टाचार रिश्वत लेने से शुरू नहीं होता। उसकी शुरुआत उस दिन होती है, जिस दिन मनुष्य दुनिया को केवल उपभोग की वस्तु समझने लगता है। और हरित उपभोक्तावाद उस दिन शुरू होता है, जिस दिन मनुष्य स्वयं से पूछता है-"मैंने इस धरती से क्या लिया?""और मैंने इस धरती को क्या दिया?"