Sunday, 2 August 2026

 

हरित उपभोक्तावाद: आवश्यकता, प्रकृति और सभ्यता का नया अर्थशास्त्र

 

" सतत विकास का वास्तविक उद्देश्य वस्तुओं का संग्रह नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता का संवर्धन है।"

- विकास अरोड़ा

 21वीं सदी को यदि किसी एक विचारधारा ने सबसे अधिक प्रभावित किया है, तो वह है उपभोक्तावाद (Consumerism) आज विश्व की अधिकांश अर्थव्यवस्थाएँ उत्पादन, विपणन और उपभोग के निरंतर विस्तार पर आधारित हैं। किसी भी देश की प्रगति का आकलन सकल घरेलू उत्पाद (GDP), उत्पादन, बिक्री और उपभोग के आँकड़ों से किया जाता है। जितना अधिक उत्पादन और उपभोग, उतनी अधिक आर्थिक वृद्धि , यह आधुनिक विकास मॉडल की सामान्य धारणा बन चुकी है। किन्तु इसी विकास मॉडल ने कुछ गंभीर प्रश्न भी हमारे सामने खड़े किए हैं। जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता का ह्रास, जल संकट, प्रदूषण, प्राकृतिक संसाधनों का तीव्र दोहन, बढ़ती आर्थिक असमानता, मानसिक तनाव, सामाजिक विघटन और अकेलेपन जैसी समस्याएँ क्या केवल संयोग हैं, या इनका संबंध हमारी उपभोग संस्कृति से भी है?
 
इन प्रश्नों का उत्तर खोजने के लिए हमें उपभोक्तावाद को केवल आर्थिक दृष्टि से नहीं, बल्कि पारिस्थितिक (Ecological), सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक दृष्टिकोण से समझना होगा। यही समझ हमें हरित उपभोक्तावाद (Green Consumerism) की ओर ले जाती है।
 
आवश्यकता, इच्छा और उपभोग के बीच संतुलन की खोज
हरित उपभोक्तावाद (Green Consumerism) को समझने से पहले हमें तीन मूलभूत शब्दों आवश्यकता, इच्छा और उपभोग का अंतर समझना होगा। यदि यह आधार स्पष्ट नहीं होगा, तो हरित उपभोक्तावाद केवल "ग्रीन उत्पाद खरीदने" तक सीमित रह जाएगा, जबकि इसका वास्तविक अर्थ मानव और प्रकृति के बीच संतुलित संबंध स्थापित करना है।
() आवश्यकता (Need)
आवश्यकता वह है जिसके बिना जीवन का संचालन संभव नहीं है। भोजन, स्वच्छ जल, वस्त्र, आवास, स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षित परिवहन जैसी आवश्यकताएँ जीवन का आधार हैं। आवश्यकता प्रकृति और मानव जीवन के बीच संतुलन स्थापित करती है।
() इच्छा (Desire)
जब मनुष्य आवश्यकताओं से आगे बढ़कर सुविधा, सौंदर्य, प्रतिष्ठा, आराम या सामाजिक पहचान प्राप्त करना चाहता है, तब इच्छा का जन्म होता है। इच्छाएँ स्वाभाविक हैं, परंतु वे असीमित होती हैं।
() उपभोग (Consumption)
जब इच्छाओं के साथ आर्थिक क्षमता अर्थात Purchasing Power जुड़ जाती है, तब वे बाजार में वस्तुओं और सेवाओं के रूप में व्यक्त होती हैं। यही उपभोग है।
अर्थशास्त्र में उपभोग को आर्थिक गतिविधि माना जाता है, किंतु पारिस्थितिकी हमें बताती है कि प्रत्येक उपभोग पृथ्वी के किसी किसी प्राकृतिक संसाधन से जुड़ा होता है।
 
उपभोग का वास्तविक अर्थ
प्रत्येक उपभोग के पीछे प्रकृति का कोई कोई संसाधन छिपा होता है।
कोई भी वस्तु बिना प्राकृतिक संसाधनों के नहीं बन सकती।
हर उत्पाद की यात्रा कुछ इस प्रकार होती है
  • प्राकृतिक संसाधनों का खनन (Mining)
  • उनका प्रसंस्करण (Processing)
  • उद्योगों में उत्पादन (Manufacturing)
  • परिवहन (Transportation)
  • विपणन (Marketing)
  • विज्ञापन (Advertising)
  • अंततः उपभोग (Consumption)
अर्थात प्रत्येक उपभोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पृथ्वी के प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करता है। इसी कारण उपभोग केवल आर्थिक गतिविधि नहीं है, बल्कि पर्यावरणीय और सामाजिक गतिविधि भी है।
 
असमानता का वास्तविक कारण
आज विश्व में जो आर्थिक और सामाजिक असमानता दिखाई देती है, उसके प्रमुख कारणों में से एक अनियंत्रित उपभोग है।
कुछ लोगों का अत्यधिक उपभोग, करोड़ों लोगों के सीमित संसाधनों का कारण बन जाता है।
वास्तव में उपभोग का अर्थ है-
प्राकृतिक संसाधनों का केंद्रीकृत खनन, उन पर शक्ति और राजनीति के माध्यम से नियंत्रण, फिर उद्योगों द्वारा उनका प्रसंस्करण, और अंततः विज्ञापन तथा बाजार के माध्यम से उन्हें उपभोक्ताओं तक पहुँचाना। यहीं से उपभोक्तावाद (Consumerism) की शुरुआत होती है।
 
उपभोक्तावाद क्या है?
उपभोक्तावाद केवल खरीदारी नहीं है। यह एक आर्थिक और सामाजिक दर्शन (Philosophy) है जो मनुष्य को लगातार अधिक उपभोग करने के लिए प्रेरित करता है। बाजार की शक्तियाँ अपना लाभ बनाए रखने के लिए नई-नई आवश्यकताएँ पैदा करती हैं। विज्ञापन हमारी इच्छाओं को आवश्यकताओं का रूप दे देते हैं। इस प्रकार मनुष्य वस्तुओं का नहीं, बल्कि इच्छाओं का उपभोक्ता बन जाता है।
 
क्या प्राकृतिक संसाधन बिकने योग्य हैं?
प्राकृतिक संसाधन किसी मनुष्य ने नहीं बनाए। जल, जंगल, भूमि, वायु, नदियाँ, पर्वत और जैव विविधता प्रकृति की धरोहर हैं। इन्हें केवल मुद्रा के आधार पर खरीदना, उन पर अधिकार स्थापित करना और फिर लाभ कमाने के लिए समाज को बेचना नैतिक दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता। इसलिए हरित उपभोक्तावाद के कुछ मूलभूत चारित्रिक गुण होने चाहिए कि-
प्राकृतिक संसाधन मानव की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि समस्त जीवन की साझा धरोहर हैं।
हरित उपभोक्तावाद का सिद्धांत
हरित उपभोक्तावाद का मूल सिद्धांत है
"मानव की आवश्यकताओं की पूर्ति प्रकृति को न्यूनतम क्षति पहुँचाकर की जाए।"
यही कारण है कि हरित उपभोक्तावाद केवल "ग्रीन उत्पाद" खरीदने की बात नहीं करता।
यह Responsible consumption, Circular Economy, Ecological/Green Economics और Nature-based Sustainable Development के सिद्धांतों पर आधारित है।
एक व्यक्तिगत अनुभव
कुछ समय पहले मुझे छत्तीसगढ़ के एक आदिवासी गाँव जाने का अवसर मिला। मेरे स्वागत में उन्होंने चाँदी या चीनी मिट्टी के बर्तनों का उपयोग नहीं किया। एक साधारण थाली में लौंग, काली मिर्च, गुड़ और पानी देकर उन्होंने अतिथि का सम्मान किया। हम सबने जमीन पर चादर बिछाकर भोजन किया। रात्रि विश्राम खुले खेतों के पास किया, जहाँ हवा में लहराती फसलें और मिट्टी की सुगंध थी। मेरे लिए एक छोटा-सा टेबल फैन लगाया गया तथा मच्छरों से बचाने हेतु मच्छरदानी लगा दी गई। अगली सुबह पूरे गाँव के लोग एक विशाल वटवृक्ष के नीचे चौपाल में एकत्र हुए। सभी लोग जमीन पर बैठे और चर्चा का विषय था-"गाँव का पानी गाँव में" — वर्षा जल संचयन और भूजल पुनर्भरण। दोपहर के भोजन में उन्होंने मुझे ताज़ा निकाला हुआ लोनी (मक्खन), रोटी, स्थानीय सब्जियाँ और छाछ परोसी। अधिकांश लोग बिना सिले हुए हाथ से बुने सूती वस्त्र पहने हुए थे। वहाँ जीवन सरल था, परन्तु सम्मान, आत्मनिर्भरता और प्रकृति से जुड़ाव अत्यंत गहरा था।
 
शहर का दूसरा दृश्य
उसी दिन शाम को मैं बिलासपुर पहुँचा, जहाँ से मुझे दिल्ली के लिए विमान पकड़ना था। मेरे लिए एक आधुनिक होटल में कमरा बुक था। विशाल भवन। सात मंज़िलें। बड़ा बिस्तर। लकड़ी के फर्नीचर। एयर कंडीशनिंग। लिफ्ट। सजावट। विद्युत उपकरण। उस भवन को बनाने में कितना सीमेंट, स्टील, रेत, पत्थर, जल और ऊर्जा लगी होगी? रात दो बजे जब मैं दिल्ली पहुँचा, तब भी पूरा महानगर जाग रहा था। सड़कें रोशन थीं। हजारों वाहन चल रहे थे। गगनचुंबी इमारतें चमक रही थीं। तब मन में प्रश्न उठा-
दिल्ली के निर्माण में पृथ्वी से कितना प्राकृतिक संसाधन निकाला गया होगा?
 
 
तीन प्रकार का उपभोग
इन अनुभवों से हमें तीन प्रकार के उपभोग दिखाई देते हैं
·         पहला, आवश्यकता आधारित उपभोग।
·         दूसरा, सुविधा आधारित उपभोग।
·         तीसरा, विलासिता और प्रदर्शन आधारित उपभोग।
इनमें से कौन-सा भारत के हरित विकास का प्रतिनिधित्व करता है?
उत्तर स्पष्ट है-आवश्यकता आधारित तथा उत्तरदायी सुविधा आधारित उपभोग।
 
क्या उपभोग हमेशा गलत है? नहीं।
उपभोग स्वयं में बुरा नहीं है। यदि चार सदस्यीय परिवार वर्षों की मेहनत से एक कार खरीदता है और उससे पूरे परिवार की सुविधा बढ़ती है, तो यह सकारात्मक उपभोग है। यदि किसी व्यक्ति को दिल्ली से गुवाहाटी तुरंत पहुँचना है और वह विमान का उपयोग करता है, तो यह उचित उपभोग है। यदि सड़कें, अस्पताल, एम्बुलेंस, विद्यालय और सार्वजनिक परिवहन समाज को बेहतर जीवन देते हैं, तो यह भी सकारात्मक उपभोग है। उपभोग मनुष्य का समय बचाता है। और जब मनुष्य का समय बचता है, तब उसके पास जीवन के वास्तविक उद्देश्य, ज्ञान, समाज और आत्मविकास के लिए अधिक अवसर होते हैं। ऐसा उपभोग (Responsible Consumerism) मानव विकास का साधन है।
उपभोग कब विनाशकारी बन जाता है?
समस्या तब शुरू होती है जब उपभोग आवश्यकता से आगे बढ़कर जीवन पर शासन करने लगता है। जब वस्तुएँ मनुष्य की सेवक रहकर उसकी मालिक बन जाती है  जब मनुष्य अपनी पहचान अपने चरित्र से नहीं, बल्कि अपने ब्रांडों से बनाने लगता है। आज अत्यधिक उपभोक्तावाद के परिणाम स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं
  • अवसाद (Depression)
  • चिंता (Anxiety)
  • नशे की प्रवृत्ति
  • अकेलापन
  • शारीरिक निष्क्रियता
  • बच्चों के आउटडोर खेलों का समाप्त होना
  • परिवारों का विघटन
  • संसाधनों का असमान वितरण
  • अमीर और गरीब के बीच बढ़ती खाई
उपभोक्तावाद ने संयुक्त परिवारों को धीरे-धीरे छोटे परिवारों में बदला और फिर व्यक्ति को अकेला कर दिया। अकेलापन मानसिक तनाव को जन्म देता है, और तनाव फिर नए उपभोग का बाजार बन जाता है। इस प्रकार बाजार समस्या भी बनाता है और समाधान भी बेचता है।
 
हरित उपभोक्तावाद की सीमा
जहाँ से उपभोग जीवन को सरल बनाने के बजाय कठिन बनाना शुरू कर दे, वहीं हरित उपभोक्तावाद की सीमा समाप्त हो जाती है। जो उपभोग-
  • प्रकृति को विषाक्त करे,
  • समाज में असमानता बढ़ाए,
  • मानसिक स्वास्थ्य को नष्ट करे,
  • परिवारों को तोड़े,
  • बच्चों से बचपन छीन ले,
  • और पृथ्वी की जीवन-धारण क्षमता को कम करे
 
वह हरित उपभोक्तावाद का भाग नहीं हो सकता।
हरित उपभोक्तावाद से पारिस्थितिक लोकतंत्र तक : विकास की पुनर्परिभाषा
अगर आप हरित उपभोक्तावाद (Green Consumerism) को सच में समझना शुरू करेंगे, तो धीरे-धीरे आपको महसूस होगा कि यह केवल "ग्रीन प्रोडक्ट खरीदने" की बात नहीं है। यह तो पूरी विकास की सोच (Development Paradigm) को बदलने की शुरुआत है।
आज हम जिस GDP की बात करते हैं, वह क्या मापती है?
अगर आप 10,000 पेड़ काट दें, तो लकड़ी बिकेगी, फैक्ट्री चलेगी, ट्रांसपोर्ट होगा, मजदूरी होगी-GDP बढ़ जाएगी।
अगर आप एक बड़ा बाँध बना दें और उसके नीचे हजारों हेक्टेयर जंगल, लाखों जीव-जंतु, हजारों साल पुरानी जैव विविधता और स्थानीय समाज डूब जाएफिर भी GDP बढ़ जाएगी।
अगर अरावली जैसे पहाड़ तोड़कर सीमेंट और पत्थर निकाल लें, तो GDP बढ़ जाएगी।
अगर समुद्र प्लास्टिक से भर जाए और फिर उसकी सफाई पर हजारों करोड़ रुपये खर्च हों, तो वह खर्च भी GDP में जुड़ जाएगा।
मतलब साफ है- आज का GDP प्रकृति के नुकसान को भी विकास मानता है।
 
क्या विकास का मतलब सिर्फ पैसा है?   या विकास का मतलब जीवन (Life) है?
मुझे लगता है कि जब यूरोप में Industrial Revolution हुई थी, तब इंसान की प्रकृति को समझने की क्षमता सीमित थी। उस समय जंगल सिर्फ लकड़ी थे, नदियाँ सिर्फ पानी थीं, पहाड़ सिर्फ पत्थर थे और समुद्र सिर्फ व्यापार का रास्ता था। Ecology, Biodiversity, Ecosystem Services, Climate Change-इनकी समझ तब नहीं थी। आज सौ-दो सौ साल बाद जब पूरी दुनिया नुकसान देख रही है, तब वही दुनिया "Sustainable Development" की बात कर रही है। यानी अब हम फिर से अपनी गलती सुधारने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन मुझे लगता है कि सुधार की शुरुआत Sustainable Development से नहीं होगी। शुरुआत होगी Green Consumerism से। क्योंकि जब तक इंसान का उपभोग नहीं बदलेगा, तब तक कोई भी विकास मॉडल टिकाऊ नहीं हो सकता।
 
जब Green Consumerism आएगा, तब हम कहेंगे GDP भी Green होना चाहिए। CSR भी Green होना चाहिए। Startup भी Green होना चाहिए। Industry भी Green होनी चाहिए। Family भी Green होनी चाहिए। Village भी Green होना चाहिए। धीरे-धीरे हम वहीं पहुँचेंगे जहाँ गांधी जी बहुत पहले पहुँच चुके थे-ग्राम स्वराज। फिर वही चर्चा शुरू होगी जो गांधी और डॉ. आंबेडकर के बीच अलग-अलग रूपों में दिखाई देती है - विकास ऊपर से आएगा?  या नीचे से पैदा होगा? सरकार समाज बनाएगी? या समाज सरकार को दिशा देगा? जैसे-जैसे मैं Green Consumerism को समझता गया, मुझे लगा कि इसका अंतिम पड़ाव केवल Green Economy नहीं है। इसका अंतिम पड़ाव है- वसुधैव कुटुम्बकम्।
 
जब इंसान खुद को प्रकृति का मालिक नहीं, बल्कि उसका एक सदस्य मानने लगे। जब नदी केवल पानी हो, बल्कि परिवार का हिस्सा हो। जब जंगल केवल लकड़ी हो, बल्कि जीवन का आधार हो। जब गाय, हाथी, मधुमक्खी, मिट्टी के जीवाणु और इंसान सभी एक ही जीवन-श्रृंखला (Chain of Life) के सदस्य माने जाएँ। मैं इसे Ecological Democracy (पारिस्थितिक लोकतंत्र) कहता हूँ। लोकतंत्र केवल मनुष्यों का नहीं होना चाहिए। लोकतंत्र उस पूरी जीवन-व्यवस्था का होना चाहिए जो इस पृथ्वी पर जीवन को चलाती है। मेरे लिए Ecological Democracy का सबसे बड़ा सिद्धांत है Continuity of Life is the First Principle of Development. "जीवन की निरंतरता ही विकास का पहला सिद्धांत है।" और इसलिए मैं मानता हूँ कि विकास के तीन पहिए अलग-अलग नहीं हैं, Science हमें समझ देता है। Innovation उस समझ को समाधान में बदलता है। Sustainability यह सुनिश्चित करती है कि वह समाधान आने वाली पीढ़ियों के लिए भी सुरक्षित रहे। यही तीनों मिलकर भविष्य का विकास मॉडल बनाएँगे। और शायद इसी रास्ते पर चलते-चलते दुनिया फिर उसी जगह पहुँचेगी, जहाँ भारत हजारों साल पहले खड़ा था-"वसुधैव कुटुम्बकम्।"
 
Innovedica Foundation and the Green Consumerism Movement:
इनोवेडिका फाउंडेशन एक गैर-लाभकारी (Not-for-Profit) संस्था है, जो नवाचार (Innovation), विज्ञान (Science), शिक्षा (Education) तथा समुदाय-आधारित पहलों (Community-led Initiatives) के माध्यम से सतत विकास को बढ़ावा देने के लिए समर्पित है। फाउंडेशन अपने तीन प्रमुख कार्यक्रमों के माध्यम से कार्य करता है, जिनमें से एक है रीबिल्ड इंडिया @2047 (Rebuild India @2047) यह एक राष्ट्रीय मिशन है, जिसका उद्देश्य भारत की स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूर्ण होने तक एक पर्यावरण-संतुलित, सामाजिक रूप से समावेशी और ज्ञान-आधारित राष्ट्र के निर्माण में योगदान देना है।
 
रीबिल्ड इंडिया @2047 मिशन का शुभारंभ 28 जून 2025 को अभयापुरी, असम में देश की 20 से अधिक संस्थाओं के प्रतिनिधियों की उपस्थिति में किया गया। यह कार्यक्रम सतत एवं सहभागी राष्ट्र-निर्माण के लिए एक सामूहिक जन-आंदोलन की शुरुआत थी।
 
पिछले दो वर्षों में इनोवेडिका फाउंडेशन ने अंतरराष्ट्रीय P-7 संवाद श्रृंखला (International P-7 Dialogues) तथा राष्ट्रीय विज्ञान, सततता और शांति संवाद श्रृंखला (National Series on Science, Sustainability and Peace Dialogues) का भी आयोजन एवं संचालन किया है। P-7 का आधार है-Peace (शांति), Planet (पृथ्वी), People (जन), Prosperity (समृद्धि), Partnership (साझेदारी), Policy (नीति) और Participation (सहभागिता)
 
इसी प्रकार "Science, Sustainability and Peace Dialogues" का मूल विषय "Meaning of Life and Meaningful Life" (जीवन का अर्थ और सार्थक जीवन) रहा है। इन संवादों के माध्यम से पारिस्थितिक सभ्यता (Ecological Civilization), उत्तरदायी विकास, सामुदायिक लचीलापन (Community Resilience) तथा सतत जीवनशैली (Sustainable Lifestyle) जैसे विषयों पर बहुआयामी विमर्श को प्रोत्साहित किया गया है।
 
इन सभी पहलों का एक प्रमुख उद्देश्य हरित उपभोक्तावाद (Green Consumerism) के सिद्धांतों को समाज के सामने रखना रहा है। हरित उपभोक्तावाद उपभोग की उस संस्कृति का समर्थन करता है, जिसमें अत्यधिक उपभोग के स्थान पर उत्तरदायित्वपूर्ण उपभोग को महत्व दिया जाता है।
 
इनोवेडिका फाउंडेशन का मानना है कि सतत विकास केवल हरित तकनीकों (Green Technologies) या पर्यावरण-अनुकूल उत्पादों (Eco-friendly Products) के उपयोग से संभव नहीं है। इसके लिए मानव के विचार, जीवन-मूल्य और उपभोग व्यवहार में मूलभूत परिवर्तन आवश्यक है।
 
हरित उपभोक्तावाद का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मानव की आवश्यकताओं की पूर्ति प्रकृति पर न्यूनतम दबाव डालते हुए की जाए, साथ ही सामाजिक समानता, प्राकृतिक संसाधनों के न्यायपूर्ण उपयोग तथा आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों की रक्षा भी सुनिश्चित हो।
 
सतत विकास के भारतीय दृष्टिकोण को आगे बढ़ाते हुए, इनोवेडिका फाउंडेशन के संस्थापक एवं अध्यक्ष श्री विकास अरोड़ा ने हरित उपभोक्तावाद का निम्नलिखित मूल सिद्धांत प्रस्तुत किया है-
"Consumerism begins where Purchasing Power meets Desire; Green Consumerism begins where Need meets Responsibility."
"जब इच्छा धन से मिलती है तो उपभोक्तावाद जन्म लेता है; जब आवश्यकता उत्तरदायित्व से मिलती है तो हरित उपभोक्तावाद जन्म लेता है।" - विकास अरोड़ा
 
उपभोक्तावाद का विषचक्र:
जब मैं उपभोक्तावाद की बात करता हूँ, तो मेरा आशय केवल बाजार में बिकने वाली वस्तुओं से नहीं है। मेरे लिए उपभोक्तावाद वह व्यवस्था है, जो पहले मनुष्य की इच्छाएँ बनाती है और फिर उन्हीं इच्छाओं को पूरा करने के लिए बाजार खड़ा कर देती है।
 
आज बाजार का सबसे बड़ा उद्देश्य मनुष्य की आवश्यकता पूरी करना नहीं, बल्कि नए उपभोक्ता बनाना है।
आप सुबह अखबार उठाइए। टीवी खोलिए मोबाइल पर Instagram, Facebook या YouTube देखिए। आपको हर जगह एक ही बात दिखाई देगी-विज्ञापन। और इन विज्ञापनों में सबसे अधिक किसका उपयोग होता है? महिलाओं का। साबुन बेचना हो, मोटरसाइकिल बेचनी हो, सीमेंट बेचना हो, मोबाइल बेचना हो, घड़ी बेचनी हो, कपड़े बेचने हों, यहाँ तक कि ऐसी वस्तुएँ भी जिनका महिलाओं से कोई सीधा संबंध नहीं है-फिर भी विज्ञापन में महिला को सामने रखा जाता है।
 
क्यों? क्योंकि बाजार जानता है कि आकर्षण सबसे तेज़ी से ध्यान खींचता है। वह पुरुष और महिलादोनों उपभोक्ताओं के मनोविज्ञान को समझता है। उसका उद्देश्य किसी विचार का प्रचार करना नहीं, बल्कि उत्पाद बेचना होता है।
आज स्थिति यहाँ तक पहुँच गई है कि बाजार केवल वस्तुएँ नहीं बेचता, बल्कि भावनाएँ भी बेचता है। सौंदर्य बेचता है। सफलता बेचता है। आज़ादी बेचता है।
 
हाल ही में BBC Eye की एक खोजी रिपोर्ट ने यह उजागर किया कि भारत में Instagram पर ऐसे भुगतान किए गए विज्ञापन (Paid Advertisements) चल रहे थे, जो बाल यौन शोषण सामग्री (Child Sexual Abuse Material - CSAM) तक पहुँचने का रास्ता बना रहे थे। यह केवल एक तकनीकी गलती नहीं थी, बल्कि यह दिखाता है कि जब विज्ञापन प्रणाली का एकमात्र लक्ष्य अधिक से अधिक क्लिक और अधिक से अधिक कमाई बन जाए, तब नैतिक सीमाएँ भी कमजोर पड़ने लगती हैं।
 
यही उपभोक्तावाद का सबसे खतरनाक रूप है।
 
जब बाजार मनुष्य की कमजोरियों को समझकर उन्हें ही अपने लाभ का साधन बना ले। इतिहास में भी इसके उदाहरण मिलते हैं। बीसवीं शताब्दी में कुछ तंबाकू कंपनियों ने महिलाओं में धूम्रपान को "स्वतंत्रता" और "समानता" के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करने वाले प्रचार अभियान चलाए। संदेश यह दिया गया कि यदि पुरुष धूम्रपान कर सकते हैं तो महिलाएँ क्यों नहीं? परिणाम यह हुआ कि महिलाओं में भी धूम्रपान बढ़ा और कंपनियों का बाजार कई गुना बड़ा हो गया।
 
यहाँ प्रश्न महिला स्वतंत्रता का नहीं है।
 
प्रश्न यह है कि क्या बाजार किसी भी सामाजिक आंदोलन, भावना या विचार का उपयोग अपने उत्पाद बेचने के लिए कर सकता है? दुर्भाग्य से उत्तर है-हाँ।
और अब तो उपभोक्तावाद राजनीति में भी प्रवेश कर चुका है। अनेक कल्याणकारी योजनाएँ वास्तव में ज़रूरी हैं और उनका अपना सामाजिक महत्व है, लेकिन हमें यह भी समझना होगा कि जब नागरिक केवल लाभ पाने वाले उपभोक्ता (Consumer Citizen) में बदलने लगते हैं, तब लोकतंत्र का स्वरूप भी बदलने लगता है। नागरिक और उपभोक्ता के बीच का अंतर समाप्त नहीं होना चाहिए।
 
मेरी चिंता किसी महिला, किसी योजना या किसी आंदोलन से नहीं है। मेरी चिंता उस बाजार से है, जो हर भावना को वस्तु में बदल देता है।
जिस दिन प्रकृति बिकने लगे, उस दिन जंगल समाप्त होने लगते हैं।
जिस दिन लोकतंत्र बिकने लगे, उस दिन नागरिक उपभोक्ता बन जाते हैं।
और जिस दिन मनुष्य स्वयं बिकने लगे, उस दिन उपभोक्तावाद अपना सबसे भयावह रूप दिखाता है।
यही मैं "उपभोक्तावाद का विषचक्र " कहता हूँ।
उपभोक्तावाद आपके चारों ओर है।
सुबह आँख खुलने से लेकर रात को सोने तक 24 घंटे हर पल आपको शायद इसका एहसास भी नहीं होता कि आपका कितना जीवन बाजार तय कर रहा है। ज़रा सोचिए- मनुष्य के अलावा कौन-सा जीव प्रतिदिन टूथब्रश और टूथपेस्ट का उपयोग करता है?
कुछ वर्ष पहले मेरी मुलाकात AIIMS के एक डॉक्टर से हुई थी। हमारी चर्चा स्वास्थ्य स्वराज पर हो रही थी। उन्होंने कहा कि बार-बार ब्रश करने से हमारे मुख का प्राकृतिक माइक्रोफ्लोरा प्रभावित होता है और शरीर की प्राकृतिक संतुलन व्यवस्था में परिवर्तन सकता है। उस चर्चा के बाद मेरे मन में एक प्रश्न पैदा हुआ। हम रोज़ नया टूथपेस्ट खरीदते हैं।
 
टीवी पर नया विज्ञापन देखते हैं। कंपनी कहती है-यह नया फॉर्मूला है, यह पहले से बेहतर है, यह ज्यादा सफेदी देगा, यह ज्यादा सुरक्षा देगा। लेकिन क्या हमने कभी उसके पीछे लिखे Ingredients पढ़े हैं? क्या हम जानते हैं कि हम अपने शरीर में क्या उपयोग कर रहे हैं? या हम केवल विज्ञापन देखकर निर्णय लेते हैं?
आज बाजार जैसा चाहता है, वैसा हमें चलाता है।
हमारी पसंद, हमारी आदतें, हमारी जरूरतें सब धीरे-धीरे बाजार तय करने लगता है। यही उपभोक्तावाद की सबसे बड़ी शक्ति है। वह पहले हमारी सोच बदलता है, फिर हमारी आदतें बदलता है, और अंत में हमारा जीवन बदल देता है। आज आम मनुष्य की स्थिति यह हो गई है कि वह जीवन के उस मूल प्रश्न पर सोचने का समय ही नहीं निकाल पाता, जिसके उत्तर की खोज में सिद्धार्थ ने राजमहल छोड़ दिया और बुद्ध बने। जिस प्रश्न के उत्तर में महावीर ने अपरिग्रह और संयम का मार्ग बताया। जिसके लिए राम ने अपने पूरे जीवन में त्याग, मर्यादा और उत्तरदायित्व का आदर्श प्रस्तुत किया और श्रीकृष्ण ने अभाव और संघर्ष के बीच भी जीवन-प्रबंधन का अद्भुत उदाहरण दिया।
यदि हम इन सभी महापुरुषों के जीवन को ध्यान से देखें, तो पाएँगे कि उन्होंने उपभोग का विरोध नहीं किया। उन्होंने अनियंत्रित उपभोग का विरोध किया। उन्होंने आवश्यकता के अनुसार जीवन जीना सिखाया, लालच के अनुसार नहीं। मेरी दृष्टि में यही उत्तरदायी उपभोग (Responsible Consumerism) है। और यही आगे चलकर हरित उपभोक्तावाद (Green Consumerism) का आधार बनता है।
 
निष्कर्ष
हरित उपभोक्तावाद का उद्देश्य उपभोग समाप्त करना नहीं है, बल्कि उसे विवेकपूर्ण, न्यायपूर्ण और प्रकृति-सम्मत बनाना है। हमें आवश्यकता और लालसा के बीच का अंतर समझना होगा। विकास का अर्थ अधिक वस्तुएँ नहीं, बल्कि बेहतर जीवन होना चाहिए।
यदि मानव की आवश्यकताओं की पूर्ति प्रकृति को न्यूनतम क्षति पहुँचाकर, संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण करते हुए और आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों की रक्षा करते हुए की जाती है, तभी उसे वास्तविक अर्थों में हरित उपभोक्तावाद (Green Consumerism) कहा जा सकता है।
"पृथ्वी हर मनुष्य की आवश्यकता पूरी कर सकती है, लेकिन किसी एक मनुष्य के लालच को नहीं।" - Mahatma Gandhi 
यही हरित उपभोक्तावाद का मूल दर्शन है।

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